ईश्वर ने इस संसार को बनाया है। एक सुंदर प्राकृति की रचना की है। जहाँ मानव जाति की उत्पति की है वहीँ पशु, पक्षी, पेड़, पौधे, नदी, पहाड़ आदि भी ईश्वर की ही देन हैं। सभी जीवों में मानव को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। परन्तु पशु पक्षी भी जीव है। वह भी काफी कुछ मनुष्य की ही तरह करते हैं। उन्हें भी जीवित रहने के लिए भोजन, पानी की आवश्यकता होती है वह भी सर्दी, गर्मी, बरसात का अनुभव करते हैं।
एक समय की बात है ईश्वर की बसाई इस दुनिया में एक बड़े शहर से सुदूर एक छोटी बस्ती थी। वहां सब कुछ प्राकृतिक रूप में ही दिखाई देता था। मानव, पशु पक्षी सब मिलजुल करके रहते थे। गर्मी के दिन थे। दोपहर के समय गर्म हवा भी चल रही थी कि कहीं से अचानक एक चिंगारी उड़ करके आई और बस्ती में आग लग गई। देखते ही देखते आग बढ़ने लगी। बस्ती के लोग अपने अपने सामर्थ्य से पानी लाकर आग को बुझाने में जुटे थे। इसी दौरान लोगो ने देखा कि एक चिड़िया भी अपनी चोंच में पानी भरकर बार बार आग के ऊपर डाल रही है। कुछ समय पश्चात जब आग पर काबू पा लिया गया। सब कुछ निपट गया। तो सब लोग झुंड बनाकर उसी पेड़ के नीचे खड़े हो करके आपस में बात कर रहे थे, जिस पेड़ के ऊपर उसी चिडिया का घोंसला था जो चोंच में भरभर के पानी ला करके सबके साथ साथ आग बुझाने के काम में लगी हुई थी। इसी बीच किसी ने उस चिड़िया को अपने ऊपर की टहनी पर बैठे देखा। तभी उस चिड़िया से किसी ने पूछा कि क्या उसे अपनी जान की परवाह नहीं थी कि वह बार बार चोंच में बूँद बूँद पानी ला करके आग पर उड़ेल रही थी। क्या इससे कोई फर्क पड़ने वाला था। इससे आग बुझना तो दूर उसकी तपिश में भी कोई कमी नहीं आने वाली थी।
इस सब को सुनकर चिड़िया बोली कि मैं जानती हूँ कि मेरे इस छोटे से प्रयास से आग की लपटों पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है, पर यह भी जानती हूँ कि मैं भी आप लोगो के साथ इसी बस्ती में रहती हूँ और मेरा भी कर्तव्य बनता है कि इस विपत्ति के समय मुझे भी अपना योगदान अवश्य देना चाहिए। विपत्ति काल में जो लोग भाग जाते हैं वह माफ़ी के काबिल नहीं होते। इसलिए मैं तो बस चोंच भर पानी से सांकेतिक ही सही अपना कर्तव्य निभा रही थी। इसे सुनकर सभी लोग आवाक रह गए और उस नन्ही चिड़िया के प्रयास की सरहाना करने लगे।
चिड़िया की इस प्रयास से हमें यह शिक्षा मिलती है कि चाहे जितनी भी मुश्किल क्यों ना हो हमें अपनी हिम्मत और होंसले को बनाए रखते हुए अपने प्रयास करते रहना चाहिए।