प्राचीन काल से भारतवर्ष में अनेको धार्मिक उत्सव नदियों के किनारे मनाये जाते रहे है। मनुष्य दूर दूर से अनेक पर्वो पर पवित्र नदियों के जल में स्नान करने के लिए आते रहे है। धार्मिक रूप से यह भी कहा जाता रहा है कि फलां धार्मिक पर्व पर फ़्लां स्थान या फलां नदी या सरोवर के जल में स्नान करने से मनुष्य के पाप धुल जाते है। क्या ऐसा लगता है, क्या यह संभव है या इस के पीछे उदेश्य कुछ अलग ही रहा होगा। जो की समय के साथ साथ बदलता चला गया।
इस बात से तो इंकार नहीं किया जा सकता कि विभिन्न नदियों या सरोवरों का जल निर्मल नहीं है या वह बाकी की नदियों या सरोवरो से ज्यादा महवपूर्ण है। इसके कारण भी अलग अलग हो सकता है। जैसे (हिन्दू मान्यताओं के अनुसार) राजा भगरिथ द्वारा अत्यंत कठिन तप/साधना के बाद ही गंगा नदी का पृथ्वी पर अवतरण हुआ। तो निश्चित ही वह अन्य नदियों से अलग है। इसी कारण से उसकी पवित्रता भी असीम है। उसके जल का महत्व ही अलग है। इसी प्रकार गोदावरी भी उतनी ही पवित्र है जितनी गंगा। बल्कि गोदावरी तो दक्षिण की गंगा के नाम से ही प्रसिद्ध है। इसी प्रकार अनेको सरोवर हैं जिनकी धार्मिक पहचान है। जैसे कैलाश स्थित मान सरोवर है। वहां आज भी लोग पूर्ण श्रद्धा के साथ जाकर स्नान करके अपने पापों का नाश करना चाहते हैं।
हम यह तो नहीं जानते कि मनुष्य के पापों में से कुछ या सारे भी इन नदियों या सरोवरों के पवित्र जल से मनुष्य के पाप धूल जाते हैं। परन्तु इतना तो तय है कि जब मनुष्य दूर दूर से सच्ची श्रद्धा के साथ ऐसे स्थानों पर जाकर उस पवित्र जल में डुबकी लगाता है तो निश्चित तौर पर उसके अन्दर इस बात का बौद्ध होता होगा कि उसने जो गलतियां पूर्व में की है वह उसे नहीं करनी चाहियें थीं। यह बात अलग है कि ज्यादातर लोग पुनः वही सब करने लग जाते हैं। तो इसके इन पवित्र स्थानों का क्या दोष है, इससे उनकी पवित्रता, निर्मलता पर तो आंच नहीं ही आनी चाहिए।
इससे यह बात समझ में आती है कि नदियाँ, सरोवर पवित्र हैं और उनके पवित्र जल से मनुष्य भी पवित्र हो सकता है यदि वह स्नान करने के साथ साथ अपने विचारों को भी पवित्रता, निर्मलता प्रदान करता है। इसी को हम धार्मिक स्नान समझते हैं।