कमाई की परिभाषा


दुनियाभर में हर व्यक्ति अपने अपने सामर्थ्य से कमाई करता है। कोई नित प्रतिदिन नौकरी पर जाता है। इसमें से भी कोई सरकारी तो कोई प्राइवेट में कार्य करता है। इसके अतिरिक्त लोग व्यापार भी करते हैं। कुछ लोग तो दूसरों को मूर्ख बना करके ठगी का भी काम करते हैं। जबकि कुछ लोग भिक्षा मांग करके अपना काम चला लेते हैं। यहाँ पर मेहनत के अलावा भाग्य का भी बड़ा अहम रोल होता है। यूं कहिये कि मनुष्य के जीवन में भाग्य एक बड़ा किरदार होता है। 


कमाई की क्या परिभाषा होनी चाहिए। क्या एक व्यक्ति कुछ रकम हर माह वेतन के रूप में पाता है यही उसकी कमाई है। अथवा कोई व्यक्ति अपने व्यापार से जितना लाभ अर्जित करता है उस लाभ को ही उसकी कमाई समझ लिया जाए। फिर तो जो व्यक्ति दूसरों को ठग करके इक्क्ठा करता है और भिक्षुक जितना दान में इक्क्ठा करता है वही उसकी कमाई होगी। 


कमाई की परिभाषा को इतने में सीमित करना उचित प्रतीत नहीं होता है। इससे तो यह प्रतीत होता है जो व्यक्ति किसी काम को नहीं करता तो वह कुछ भी अर्जित नहीं करता। शायद यह गलत होगा। हमारी नजर में हर व्यक्ति अवश्य ही कुछ न कुछ कमाता है। वह प्राणी भी जो घर पर रहता है अर्थात काम पर नहीं जाता। वह स्त्री हो या पुरुष। हर मनुष्य जीवन में कुछ ना कुछ कमाता रहता है वह भी उसकी कमाई होती है। यह कुछ ना कुछ क्या, कितना है। यह उस व्यक्ति विशेष की योग्यता पर निर्भर करता है। 


जब व्यक्ति मान सम्मान प्राप्त करता है तो यह भी उसकी कमाई होती है। जब व्यक्ति अपने रिश्ते रुपी किरदार को अच्छे से निभाता है जो समाज में मिसाल बन जाता है तो यह भी उसकी कमाई होती है। जब व्यक्ति अपने अनुभव से दूसरे को लाभ पहुंचाता है तो यह भी उसकी कमाई होती है। इसी प्रकार कोई सन्यासी भी अपने उपदेश से जनमानस का भला करता है तो यह उसकी कमाई ही कहलाएगी। 


इस प्रकार से मात्र चंद मुद्रा का अर्जन ही कमाई नहीं होती। बल्कि अनुभव, रिश्ते, मान सम्मान, सबक, दोस्ती, आदि भी कमाई के ही रूप में गिने जाँयगे। यही कमाई की सच्ची परिभाषा होगी।